आगर मालवा। जिला चिकित्सालय आगर में अव्यवस्थाओं और लापरवाही का दौर थमने का नाम नहीं ले रहा है। आए दिन मरीजों के इलाज में अनदेखी, गर्भवती महिलाओं व नवजात शिशुओं की मौत के मामले सामने आने के बावजूद स्वास्थ्य प्रशासन गहरी नींद में सोया हुआ है। आलम यह है कि कभी अस्पताल की पेयजल टंकियों में सड़े-गले पक्षी मिलते हैं, तो कभी मरीजों को गलत जांच रिपोर्ट थमा दी जाती है।
ताजा मामला शुक्रवार (21 अगस्त) का है। एक ग्रामीण अपनी बीमार बेटी का इलाज कराने जिला अस्पताल पहुंचा था। डॉक्टरों के परामर्श पर उसने अस्पताल की पैथोलॉजी लैब में पर्चे पर दर्ज पते के अनुसार खून की जांच करवाई। शाम को जब रिपोर्ट मिली, तो उस पर नाम और पता गलत दर्ज था। ऐसे में यह स्पष्ट ही नहीं हो सका कि लैब से मिली रिपोर्ट वास्तव में उसी मरीज की है या किसी अन्य की।
विरोध करने पर भी नहीं हुई सुनवाई -जब ग्रामीण ने गलत रिपोर्ट का विरोध करते हुए सही जांच रिपोर्ट देने की मांग की, तो लैब कर्मचारियों ने अपनी गलती सुधारने के बजाय उसे वापस लौटा दिया। पीड़ित का आरोप है कि उससे कहा गया कि “रिपोर्ट सही है, इसे ही डॉक्टर को दिखा दो और इसी के आधार पर इलाज होगा।” ऐसे में सवाल यह उठता है कि गलत नाम-पते वाली रिपोर्ट के आधार पर किया जाने वाला इलाज मरीज के लिए कितना घातक सिद्ध हो सकता है?
जांच समितियां बनीं, लेकिन कार्रवाई शून्य – अस्पताल में व्यवस्था सुधार के नाम पर अब तक कई जांच कमेटियों का गठन किया जा चुका है, लेकिन न तो जांच रिपोर्ट सार्वजनिक होती है और न ही दोषियों पर कोई ठोस कार्रवाई की जाती है। पीने के पानी की टंकियों में मृत पक्षी मिलने जैसे गंभीर मामले में भी अब तक किसी की जवाबदेही तय नहीं की गई है।
> क्या कहते हैं जिम्मेदार?> इस पूरे मामले पर जिला चिकित्सालय के सिविल सर्जन से फोन पर संपर्क करने का प्रयास किया गया, लेकिन उनसे बात नहीं हो सकी। इसके बाद उन्हें व्हाट्सएप के जरिए मामले की जानकारी भेजी गई, जिस पर उन्होंने संक्षिप्त जवाब देते हुए कहा कि “मामले को दिखवाया जाएगा।”
अब देखना यह होगा कि हर बार की तरह यह मामला भी ठंडे बस्ते में चला जाता है या फिर लापरवाह कर्मचारियों पर कोई सख्त कदम उठाया जाएगा।
