राज कुमार – आगर मालवा। जिले में शिक्षा व्यवस्था की ज़मीनी सच्चाई सरकार के दावों से बिल्कुल अलग नजर आ रही है। जिले के कई सरकारी स्कूल इस कदर खस्ताहाल हैं कि वे बच्चों की पढ़ाई से ज्यादा उनकी जान के लिए खतरा बन चुके हैं। बरसात के मौसम में टपकती छतें, दरकती दीवारें और चारों ओर फैला खतरा – यही अब इन स्कूलों की पहचान बन चुकी है। कुछ गांवों में तो हालात इतने बदतर हैं कि बच्चों को मंदिरों और चबूतरों पर बैठकर पढ़ाई करनी पड़ रही है। आखिर ऐसे हालात में बच्चों का भविष्य कैसे संवरेगा ये तस्वीरें किसी पुरानी फिल्म की नहीं, बल्कि हकीकत हैं – आगर मालवा जिले के चक पचौरा गांव की। यहां सरकारी स्कूल की इमारत इतनी जर्जर हो चुकी थी कि उसे करीब 10 महीने पहले गिरा दिया गया। लेकिन नया भवन अब तक नहीं बन पाया, और बच्चों को पढ़ाई के लिए खेतों के पास बने एक मंदिर के आंगन में बैठना पड़ रहा है।
टीन शेड के नीचे बच्चे पढ़ाई करते हैं, जहां न बारिश से बचाव है, न गर्मी से राहत। खुले मैदान में बैठकर पढ़ने वाले इन मासूमों के लिए हर मौसम एक नई चुनौती लेकर आता है। और यही नहीं – यहां जहरीले जीव-जंतुओं का भी खतरा बना रहता है। रिपोर्टिंग के दौरान कैमरे ने एक नेवले का झुंड स्कूल परिसर के पास घूमते हुए कैद किया। धार्मिक आयोजनों के चलते बच्चों को बीच में पढ़ाई छोड़कर मंदिर का आंगन भी खाली करना पड़ता है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या यही है वो ‘सशक्त शिक्षा’ का वादा, जिस पर सरकारें बार-बार जोर देती हैं?

चक पचौरा अकेला एक ऐसा गांव नहीं है। जिले में ऐसे कई सरकारी स्कूल हैं जो या तो गिरने की कगार पर हैं, या पहले ही जमींदोज हो चुके हैं। विभाग ने करीब 77 स्कूलों को जर्जर घोषित कर भवन तो गिरा दिए, लेकिन उनकी जगह नए स्कूल अब तक नहीं बन पाए। कहीं मंदिर स्कूल बन गया है, तो कहीं बच्चे खुले मैदान में बैठकर पढ़ने को मजबूर हैं। स्कूल चले हम’ जैसे अभियान ज़मीन पर दम तोड़ते नजर आ रहे हैं।

बच्चों को न तो सुरक्षित शिक्षा का माहौल मिल पा रहा है, न ही स्थायी समाधान की कोई दिशा दिख रही है। अब देखने वाली बात यह होगी कि अधिकारी और सरकार कब जागते हैं, और कब इन बच्चों को मिलता है उनका हक – एक सुरक्षित और सम्मानजनक स्कूल भवन।
